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खिलती कली हो तूम...

 खिलती कली हो तूम... कुछभी करके ... तुम्हें अपने दिलमें छिपाना होगा खिलती कली हो तूम , तुम्हें काटोंसें बचाना होगा प्यार की दुश्मन दुनिया होगी तो क्या हुआ ... ?  प्यार में हैं हम, तो प्यारका वादा निभाना होगा देखो , अब तो पहलेसेभी बढकर पहरे खडे हैं अब तो और संभलकर तीर-ए-नजर चलाना होगा  खूश रहे तूम जीवनभर , हसती खिलती रहे...   तुम्हारे चेहरेपर दुनियाभरकी खुशीको लाना होगा #खिलतीकली ... देवीदास हरिश्चंद्र पाटील  शनिवार, ०८.१०.२०२२ सुबह ०६.४५

तुम्हे इस रास्तेसे आते हुए मैं देखूं

 तुम्हे इस रास्तेसे आते हुए मैं देखूं तुम्हे इस रास्तेसे आते हुए मैं देखूं और खुदको हसते , गाते हुए मैं देखूं जाते जाते मेरी ओर तुने जो देख लिया ऐसेही प्यार तुम्हें जताते हुए मैं देखूं पुराना सपना मेरा अब सच हो रहा हैं तुम्हारे इस हसीसे दर्द जाते हुए मैं देखूं सब जो साथी थे साथ छोडकर भागे तुम्हें जीवनभर साथ निभाते हुए मैं देखूं अब चंद बातोंसे मेरा दिल नहीं भरता  हर वक्त तुमसे करते बाते हुए मैं देखूं ... देवीदास हरिश्चंद्र पाटील 

ये तेरा मुस्कुराना..

 ये तेरा मुस्कुराना.. ये तेरा मुस्कुराना कुछ कहता हैं  ये नजरे चुराना कुछ कहता हैं ...  ये तेरा आंखे झुकाकर भाग जाना झिझकना, इतरांना कुछ कहता हैं  सूरज तप्त होकर भी , दिन में चांद का आना कुछ कहता हैं  दिल में बातोंका समिंदर लेकर भी  वो तेरा होठ सिलाना कुछ कहता हैं  रास्ते में बाप को आगे रखना और  मां के पिछे छिप जाना कुछ कहता हैं  ... देवीदास हरिश्चंद्र पाटील  ०४.०४.२०२५ सुबह ०७.१५

ऑंखसे ऑंख लडी

ऑंखसे ऑंख लडी ऑंखसे ऑंख लडी तो बातभी आगे बढी  मैं गुलछबू था और वोभी थी गुलछडी सामने उसका घर खिडकीमें वोभी खडी मैंने देखा... उसने देखा... मैं हसा ... वो हस पडी ... रंगीन हुयी...  हसीन हुयी...   हम मिले थे वो घडी  ... देवीदास हरिश्चंद्र पाटील 

तेरी आखोंका यह काजल

तेरी आखोंका यह काजल तेरी आखोंका यह काजल मुझे लगता है जैसे मेरी गझल मैं शायद तुमसे प्यार करता हूॅं तू लगती हो मुझे, सपनोंका महल मैं ढुंढता हूॅं तुमको सारी दुनिया में मगर तूम मेरे दिल में मची हलचल तुमसे कोई पुराना रिश्ता हैं मेरा जैसे रिमझिम सावन और वो बादल तेरा ये हाथ मेरे हाथमें आ जाये फिर कहीं न जाये तेरा ये आचल...  ... देवीदास हरिश्चंद्र पाटील

हुनर

 हूनर         लिखना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं इतना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं हारता हूॅं इसलिये के जीत नहीं सकता जितना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं ये रात बीत जायेगी, चाॅंद निकल जायेगा  सपना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं तूम मिलो न मिलो, मिलनेकी आस तो हैं  मिलना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं बात रखनेका हूनर शायद नहीं हैं मुझमें कहना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं     #हुनर                        ... देवीदास हरिश्चंद्र पाटील

आरंभ

नमस्कार दोस्तो !  यह ब्लॉग गजल के बारे में हैं | यहाँ मेरी गजले तो होगीही मगर औरोंकी भायी हुई गजलें भी होगी| ... देवीदास हरिश्चंद्र पाटील ( अॅडमिन )