ऑंखसे ऑंख लडी
ऑंखसे ऑंख लडी
ऑंखसे ऑंख लडी
तो बातभी आगे बढी
तो बातभी आगे बढी
मैं गुलछबू था और
वोभी थी गुलछडी
सामने उसका घर
खिडकीमें वोभी खडी
वोभी थी गुलछडी
सामने उसका घर
खिडकीमें वोभी खडी
मैंने देखा... उसने देखा...
मैं हसा ... वो हस पडी ...
मैं हसा ... वो हस पडी ...
रंगीन हुयी... हसीन हुयी...
हम मिले थे वो घडी
हम मिले थे वो घडी
... देवीदास हरिश्चंद्र पाटील
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