तेरी आखोंका यह काजल तेरी आखोंका यह काजल मुझे लगता है जैसे मेरी गझल मैं शायद तुमसे प्यार करता हूॅं तू लगती हो मुझे, सपनोंका महल मैं ढुंढता हूॅं तुमको सारी दुनिया में मगर तूम मेरे दिल में मची हलचल तुमसे कोई पुराना रिश्ता हैं मेरा जैसे रिमझिम सावन और वो बादल तेरा ये हाथ मेरे हाथमें आ जाये फिर कहीं न जाये तेरा ये आचल... ... देवीदास हरिश्चंद्र पाटील
हूनर लिखना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं इतना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं हारता हूॅं इसलिये के जीत नहीं सकता जितना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं ये रात बीत जायेगी, चाॅंद निकल जायेगा सपना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं तूम मिलो न मिलो, मिलनेकी आस तो हैं मिलना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं बात रखनेका हूनर शायद नहीं हैं मुझमें कहना तो चाहता हूॅं मगर डर लगता हैं #हुनर ... देवीदास हरिश्चंद्र पाटील
ऑंखसे ऑंख लडी ऑंखसे ऑंख लडी तो बातभी आगे बढी मैं गुलछबू था और वोभी थी गुलछडी सामने उसका घर खिडकीमें वोभी खडी मैंने देखा... उसने देखा... मैं हसा ... वो हस पडी ... रंगीन हुयी... हसीन हुयी... हम मिले थे वो घडी ... देवीदास हरिश्चंद्र पाटील
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें